परिचय

श्री रैनाथ ब्रह्मदेव शिक्षा समिति, सलेमपुर, देवरिया

श्री रैनाथ मिश्र वत्सगोत्रीय ब्राहम्ण थे, जो मयूर भट्ट के वंशवष्क्ष के अनुसार सातवीं पीढ़ी के थे | मयूर भट्ट और बार्णभट्ट चचाजात, भाई, संस्कष्त के प्रसिद्ध, कवि, महाराज हर्ष देव द्वारा भट्ट की उपाधि से समलंकष्त उनकी राजसभा के पण्डित थे | कालान्तर में मयूर भट्ट जी के अयोध्या नरेश बोधिदेव से प्राप्त पांच गांवों की जागीर (चैनपुर, चन्नाडीह, फरियावंडीह , ककराडीह एवं रेवली) की देखभाल करने के कारण हर्ष की राजसभा छोड़ दी थी |

मयूर भट्ट की पहली पत्नी नागसेनी से पुत्र नागेश भट्ट हुए और दूसरी पत्नी सूर्यप्रभा के लडके का नाम विश्वसेन था | उसी विश्वसेन के नाना महाराज बौद्धिदेव ने उसे मध्यपाली (मझौली) का राजा बनाया, जिससे विसेनवंश चला | ऊपर कहा जा चुका है कि श्री रैनाथ मिश्र मयूर की सातवीं में हुए | मयूर के नागेश, नागेश के माधव, माधव के रामलक्षण, रामलक्षण के निर्मल, निर्मल के शिव प्रसन्न और शिव प्रसन्न के श्री रैनाथ मिश्र |

श्री रैनाथ बड़े ही नैष्ठिक और आचरण शील व्यक्ति थे | वे रेवली में अपना अधिकांश समय- बिताते थे | यदा-कदा पयासी भी देख लिया करते थे | एक बार आर्थिक विपन्नता के कारण वे मझौली राज की लगान राशि जमा नहीं कर सके थे | उसकी वसूली के लिए महाराज के सिपाहियों ने रेवली पहुंचकर उनसे लगान की मांग की | श्री रैनाथ जी ने उनसे कुछ दिनों के लिए मुहल्लत मांग ली | उन दिनों महाराज शिकार खेलने के लिए चम्पारन चले गये थे | पुन: शीघ्र सिपाहियों ने रेवली में जाकर श्री रैनाथ जी को मझौली जाने के लिए तैयार कर लिया | वाध्य होकर श्री रैनाथ मिश्र अपने एक सेवक कुर्मी के साथ मझौली को चल दिए | उन के पीछे-पीछे उनकी कुतिया भी चल दी | सिपाहियों ने उन्हें बंदीगृह में बन्द कर दिया |

श्री रैनाथ जी ने अनशन करने का संकल्प कर लिया | राजा साहब भी चम्पारन से वापस आ गये | उनहोंने भी उनसे अनशन तोड़ने का आग्रह किया, वरन श्री रैनाथ जी अपने संकल्प पर अडिंग रहे | अन्ततः बीसवे या इक्कसवें दिन उनका बड़ा शरीर छूट गया | मझौली राजभवन से लगभग तीन किलोमीटर दक्षिण-पूर्व कोड़रा ग्राम वासियों ने ब्रह्म जी का चौरा निर्माण किया एवं उनकी पूजा-अर्चना करने लगे |

श्री रैनाथ ब्रह्म की उक्त स्थली आज से 20-25 वर्ष गहन जंगल के बीच थी, जो नितान्त एकान्त और भयावनी थी | यद्यपि वर्तमान में वह स्थान अत्यन्त रमणीय बनाया जा चुका है तो भी उसका पश्चिमी भाग जंगल ही है | पूर्वी भाग में श्री रैनाथ ब्रह्म जी कामव्य एवं विशाल मंदिर यज्ञशाला है | वे एक वत्सगोत्र के प्रथम ब्रह्मण थे | जिनके नाम पर श्री रैनाथ ब्रह्मदेव शिक्षा समिति का गठन किया गया | तथा उसका पंजीयन सोसाईटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, की धारा 21, 1960 के अन्तर्गत पंजीकृत कराया गया | संस्था आयकर की धारा 12 एवं 80 जी के अन्तर्गत पंजीकृत है | जिसके द्वारा सलेमपुर में श्री रैनाथ ब्रह्मदेव महाविद्यालय एवं गायत्री कन्या जूनियर हाई स्कूल का संचालन होता आ रहा है | उत्तर प्रदेश की सबसे पुरानी तहसील सलेमपुर होने के बावजूद भी शिक्षा अभाव को देखते हुए संस्थान के प्रबन्धक श्री गंगा दयाल मिश्र द्वारा उपरोक्त विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है | आज के युग में सलेमपुर में शिक्षा के स्तर को सुधारने हेतु कम्प्यूटर शिक्षा, रोजगार परक शिक्षा, स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा, एड्स सम्बन्धी जानकारियां भविष्य में उपलब्ध कराने की योजना है | इसके लिए संस्था के पास धन का अभाव को देखते हुए भारत सरकार, राज्य सरकार एवं विदेशी फण्डिंग एजेन्सियों से धन की अपेक्षा की जा रहा है | यदि भविष्य में किसी भी संसाधन से धन प्राप्त होता है तो संस्था अपने लक्ष्यों तक अवश्य ही पहूंचेंगी, तथा समाज में लोगों को जागरुक बना सकेगी एवं कृषकों के लिए विशेष शिक्षा के अन्तर्गत कृषकों के लिए भी स्कूलों की स्थापना करेगी |